जय शुम्भ-निशुम्भ कपालधरे,प्रणमामि तु देवि नमो वरदे|
जय चन्द्र-दिवाकर नेत्रधरे,जय पावक भूषित वक्त्र धरे|
जय भैरवदेहनिलीन परे ,जय अन्धकदैत्य विशोष करे |
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पश्यन्ति सप्तमं सर्वे शनि जीव कुजः पुनः । विशेषतश्च त्रिदशत्रिकोणचतुरष्टमान् || भावः - यहाँ पर ग्रहों की दृष्टि के बारे में बतलाते हु...
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