सोमवार, अगस्त 30, 2010

सुन्दर श्लोक

जय भगवति देवि नमो वरदे,जय पाप विनाशिनी बहु फल दे |
जय  शुम्भ-निशुम्भ कपालधरे,प्रणमामि तु देवि नमो वरदे|
जय चन्द्र-दिवाकर नेत्रधरे,जय पावक भूषित वक्त्र धरे|
जय भैरवदेहनिलीन परे ,जय अन्धकदैत्य विशोष करे |
 

बुधवार, अगस्त 25, 2010

वाहन योग २



१-चतुर्थ भाव का स्वामी और नवम भाव का स्वामी दोनों एक साथ केंद्र -त्रिकोण का सम्बन्ध बनायें या एक साथ किसी केंद्र 
या त्रिकोण में बैठे तो बड़े वाहन का योग होता है |
२- यदि चन्द्र और चतुर्थ भाव के स्वामी का शुभ  सम्बन्ध ( केंद्र -त्रिकोण का सम्बन्ध ) हो तो 
३- शुक्र और चतुर्थेश का शुभ  सम्बन्ध हो तो 
४ - शुक्र और चन्द्र का केंद्र सम्बन्ध हो तो 
५- चतुर्थ भाव का स्वामी किसी उच्च ग्रह के साथ हो या स्वयं ही उच्च हो या स्वग्रही हो 
६ - कोई भी उच्च ग्रह चतुर्थ भाव में बैठा हो 
इन सभी योगों में बड़े वाहनों का योग होता है |

सोमवार, अगस्त 23, 2010

वास्तु शास्त्र और दिशा

वास्तुशास्त्र में पश्चिम दिशा

पश्चिम दिशा का स्वामी वरूण देव हैं.भवन बनाते समय इस दिशा को रिक्त नहीं रखना चाहिए.इस दिशा में भारी निर्माण शुभ होता है.इस दिशा में वास्तुदोष होने पर गृहस्थ जीवन में सुख की कमी आती है.पति पत्नी के बीच मधुर सम्बन्ध का अभाव रहता है.कारोबार में साझेदारों से मनमुटाव रहता है.यह दिशा वास्तुशास्त्र की दृष्टि से शुभ होने पर मान सम्मान, प्रतिष्ठा, सुख और समृद्धि कारक होता है.पारिवारिक जीवन मधुर रहता है.
वास्तुशास्त्र में वायव्य दिशा
वायव्य दिशा उत्तर पश्चिम के मध्य को कहा जाता है.वायु देव इस दिशा के स्वामी हैं.वास्तु की दृष्टि से यह दिशा दोष मुक्त होने पर व्यक्ति के सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आती है.लोगों से सहयोग एवं प्रेम और आदर सम्मान प्राप्त होता है.इसके विपरीत वास्तु दोष होने पर मान सम्मान में कमी आती है.लोगो से अच्छे सम्बन्ध नहीं रहते और अदालती मामलों में भी उलझना पड़ता है.
वास्तुशास्त्र में उत्तर दिशा
वास्तुशास्त्र में पूर्व दिशा के समान उत्तर दिशा को रिक्त और भार रहित रखना शुभ माना जाता है.इस दिशा के स्वामी कुबेर हैं जो देवताओं के कोषाध्यक्ष हैं.यह दिशा वास्तु दोष से मुक्त होने पर घर में धन एवं वैभव में वृद्धि होती है.घर में सुख का निवास होता है.उत्तर दिशा वास्तु से पीड़ित होने पर आर्थिक पक्ष कमज़ोर होता है.आमदनी की अपेक्षा खर्च की अधिकता रहती है.परिवार में प्रेम एवं सहयोग का अभाव रहता है.
वास्तुशास्त्र में ईशान दिशा
उत्तर और पूर्व दिशा का मध्य ईशान कहलाता है.इस दिशा के स्वामी ब्रह्मा और शिव जी हैं.घर के दरवाजे और खिड़कियां इस दिशा में अत्यंत शुभ माने जाते हैं.यह दिशा वास्तुदोष से पीड़ित होने पर मन और बुद्धि पर विपरीत प्रभाव होता है.परेशानी और तंगी बनी रहती है.संतान के लिए भी यह दोष अच्छा नहीं होता.यह दिशा वास्तुदोष से मुक्त होने से मानसिक क्षमताओं पर अनुकूल प्रभाव होता है.शांति और समृद्धि का वास होता है.संतान के सम्बन्ध में शुभ परिणाम प्राप्त होता है.
वास्तुशास्त्र में आकाश
वास्तुशास्त्र के अनुसार भगवान शिव आकाश के स्वामी हैं.इसके अन्तर्गत भवन के आस पास की वस्तु जैसे वृक्ष, भवन, खम्भा, मंदिर आदि की छाया का मकान और उसमें रहने वाले लोगों के ऊपर उसके प्रभाव का विचार किया जाता है.
वास्तुशास्त्र में पाताल
वास्तु के अनुसार भवन के नीचे दबी हुई वस्तुओं का प्रभाव भी भवन और उसमें रहने वाले लोगों के ऊपर होता है.यह प्रभाव आमतौर पर दो मंजिल से तीन मंजिल तक बना रहता है.भवन निर्माण से पहले भूमि की जांच इसलिए काफी जरूरी हो जाता है.वास्तुशास्त्र के अनुसार इस दोष की स्थिति में भवन में रहने वाले का मन अशांत और व्याकुल रहता है.आर्थिक परेशानी का सामना करना होता है.अशुभ स्वप्न आते हैं एवं परिवार में कलह जन्य स्थिति बनी रहती है।
गृहीत  

भारत का महान खगोलज्ञ

आर्यभट्ट के जन्म के वर्ष का आर्यभटीय में स्पष्ट उल्लेख है, उनके जन्म के वास्तविक स्थान के बारे में विद्वानों के मध्य विवाद है.कुछ मानते हैं कि वे नर्मदा और गोदावरी के मध्य स्थित क्षेत्र में पैदा हुए थे, जिसे अश्माका के रूप में जाना जाता था और वे अश्माका की पहचान मध्य भारत से करते हैं जिसमे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश शामिल है, हालाँकि आरंभिक बौद्ध ग्रन्थ अश्माका को दक्षिण में, दक्षिणापथ या दक्खन के रूप में वर्णित करते हैं, जबकि अन्य ग्रन्थ वर्णित करते हैं कि अश्माका के लोग अलेक्जेंडर से लड़े होंगे, इस हिसाब से अश्माका को उत्तर की तरफ और आगे होना चाहिए.


एक ताजा अध्ययन के अनुसार आर्यभट्ट चाम्रवत्तम (१०एन५१ ,७५ई४५), केरल के रहने वाले थे. अध्ययन के अनुसार अस्मका एक जैन प्रदेश था जो की श्रावान्बेल्गोला के चारों तरफ फैला हुआ था, और यहाँ के पत्थर के खम्बों के कारण इसका नाम अस्मका पड़ा. चाम्रवत्तम इस जैन बस्ती का हिस्सा था, इसका प्रमाण है भारतापुझा नदी जिसका नाम जैनों के पौराणिक राजा भारता के नाम पर रखा गया है. आर्यभट्ट ने भी युगों को परिभाषित करते वक्त राजा भारता का जिक्र किया है- दासगीतिका के पांचवें छंद में राजा भारत के समय तक बीत चुके काल का वर्णन आता है. उन दिनों में कुसुमपुरा में एक प्रसिद्द विश्वविद्यालय था जहाँ जैनों का निर्णायक प्रभाव था, और आर्यभट्ट का काम इस प्रकार कुसुमपुरा पहुँच सका और उसे पसंद भी किया गया.
हालाँकि ये बात काफी हद तक निश्चित है की वे किसी न किसी वक्त पर कुसुमपुरा उच्च शिक्षा के लिए गए थे और कुछ समय के लिए वहां रहे भी थे.[३] भास्कर I (६२९ ई.) ने कुसुमपुरा की पहचान पाटलिपुत्र( आधुनिक पटना) के रूप में की है. गुप्त साम्राज्य के अन्तिम दिनों में वे वहां रहा करते थे, यह वह समय था जिसे भारत के स्वर्णिम युग के रूप में जाना जाता है, विष्णुगुप्त के पूर्व बुद्धगुप्त और कुछ छोटे राजाओं के साम्राज्य के दौरान उत्तर पूर्व में हूणों का आक्रमण शुरू हो चुका था.

आर्यभट्ट अपनी खगोलीय प्रणालियों के लिए संदर्भ के रूप में श्रीलंका का उपयोग करते थे और आर्यभटीय में अनेक अवसरों पर श्रीलंका का उल्लेख किया है

महान गणितज्ञ भास्कराचार्य

भास्कराचार्य प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ एवं ज्योतिषी थे। इनके द्वारा रचित पुस्तक अंक गणित में सिद्धान्त शिरोमणि तथा पाटी गणित में लीलावती प्रसिद्ध है। ये अपने समय के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ थे। ये उज्जैन की बेधशाला के अध्यक्ष थे।
इनका जन्म 1114 ई0 में, विज्जडविड नामक गाँव में हुआ था जो आधुनिक पाटन के समीप था। 1150 ई0 में इन्होंने सिद्धान्त शिरोमणि नामक पुस्तक, संस्कृत श्लोकों में, चार भागों में लिखी है, जो क्रम से इस प्रकार है: (1) पाटी गणिताध्याय या लीलावती, (2) बीजगणिताध्याय (3) ग्रह गणिताध्याय तथा (4) गोलाध्याय

इनमें से प्रथम दो स्वतंत्र ग्रथ है और अंतिम दो "सिद्धांत शिरोमणि" के नाम से प्रसिद्ध हैं। इसके अलावा करणकुतूहल और वासना भाष्य तथा "भास्कर व्यवहार" और "भास्कर विवाह पटल" नामक दो छोटे ज्योतिष ग्रंथ इन्हीं के लिखे हुए हैं।

इनके "सिद्धांत शिरोमणि" से ही भारतीय ज्योतिष शास्त्र का सम्यक् तत्व जाना जा सकता है। सर्वप्रथम इन्होंने ही अंकगणितीय क्रियाओं का अपरिमेय राशियों में प्रयोग किया। गणित को इनकी सर्वोत्तम देन चक्रीय विधि द्वारा आविष्कृत, अनिश्चित एकघातीय और वर्गसमीकरण के व्यापक हल हैं। भास्कराचार्य के ग्रंथ की अन्यान्य नवीनताओं में त्रिप्रश्नाधिकार की नई रीतियाँ, उदयांतर काल का स्पष्ट विवेचन आदि है। भास्करचार्य को अनंत तथा चलन-कलन (कैलकुलस) के कुछ सूत्रों का भी ज्ञान था। इनके अतिरिक्त इन्होंने किसी फलन के अवकल को तात्कालिक गति का नाम दिया और सिद्ध किया कि d (ज्या q) = (कोटिज्या q) . dq . न्यूटन के जन्म के आठ सौ वर्ष पूर्व ही इन्होंने अपने गोलाध्याय नामक ग्रंथ में माध्यकर्षणतत्व (Low of Garvitation) के नाम से गुरुत्वाकर्षण के नियमों की विवेचना की है। ये प्रथम व्यक्ति हैं, जिन्होंने दशमलव प्रणाली की क्रमिक रूप से व्याख्या की है। इनके ग्रंथों की कई टीकाएँ हो चुकी हैं तथा देशी और विदेशी बहुत सी भाषाओं में इनके अनुवाद हो चुके हैं।

आधुनिक ज्योतिष के पितामह वराहमिहिर

 वराहमिहिर भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ थे। इनका जन्म छठी शताब्दी ईसवी में हुआ था। इनके पिता का नाम आदित्य दास था और वे अवंती के निवासी थे। 550 ई. के लगभग इन्होंने तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें वृहज्जातक, वृहत्संहिता और पंचसिद्धांतिका, लिखीं। इन पुस्तकों में त्रिकोणमिति के महत्वपूर्ण सूत्र दिए हुए हैं, जो वराहमिहिर के त्रिकोणमिति ज्ञान के परिचायक हैं।
पंचसिद्धांतिका में वराहमिहिर से पूर्व प्रचलित पाँच सिद्धांतों का वर्णन है। ये सिद्धांत हैं : पोलिश, रोमक, वसिष्ठ, सूर्य तथा पितामह। वराहमिहिर ने इन पूर्वप्रचलित सिद्धांतों की महत्वपूर्ण बातें लिखकर अपनी ओर से बीज नामक संस्कार का भी निर्देश किया है, जिससे इन सिद्धांतों द्वारा परिगणित ग्रह दृश्य हो सकें। इन्होंने फलित ज्योतिष के लघुजातक, बृहज्जातक तथा बृहत्संहिता नामक तीन ग्रंथ भी लिखे हैं। बृहत्संहिता में वास्तुविद्या, भवन-निर्माण-कला, वायुमंडल की प्रकृति, वृक्षायुर्वेद आदि विषय सम्मिलित हैं।

रविवार, अगस्त 22, 2010

वास्तु

वास्तु के कुछ उपयोगी सूत्र 
वस्तुतः वास्तु २ प्रकार का होता है  एक भूमि वास्तु और दूसरा गृह वास्तु 
भूमि वास्तु का उपयोग भूमि खरीदने के पहले जाता है और भवन वास्तु का उपयोग भवन का निर्माण करते समय| 
प्राचीन काल से मानव हमेशा कुछ नए विचारो और कार्यों के लिए प्रयास रत है उसी विधा का यह भारतीय ऋषि-मुनियों क़ि यह एक सुन्दर कृति और उत्तम परिणाम है वास्तु विद्या |
इसका उपयोग आज ही नहीं अपितु पुराने समय से किया जा रहा है आज तो केवल हम अपने घर में ज्यादा वास्तु का प्रयोग व विचार करते है पहले तो सार्वजानिक स्थलों पर भी इसका प्रयोग किया जाता था |
भवन में सुख-शांति केवल भवन के निर्माण या कुछ कमरों को व्यवस्थित कर देने से नहीं मिलती | ऋषियों ने भवन  निर्माण और उससे सम्बंधित समस्त कार्यों के लिए अनेक मुहूर्तों को भी बताया है | इसलिए हमे उन मुहूर्तों का भी प्रयोग करना उचित होगा |
क्रमशः .................

भवन योग

भवन योग 
अर्थात कुंडली में -
1चतुर्थ भाव के स्वामी के साथ  या  चतुर्थ भाव में ही शुभ गृह बैठे हो तो 
२चतुर्थ भाव का स्वामी किसी शुभ ग्रह के साथ केंद्र (१,४,७,१०)या त्रिकोण (५.९) में हो तो 
इन दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति अपनी मेहनत से अपन एभावन का निर्माण करवा-कर रहता है और उसे उत्तम गृह का योग होता है|

गुरुवार, अगस्त 19, 2010

ज्योतिष में गृह योग


ज्योतिष से हम जहाँ हर विषय को जन सकते हैं वहीँ हम अपना घर कैसा होगा ? कब होगा? हम उसमे सुखी रहेंगे या नहीं
इन सभी विषयों का विचार भी हम ज्योतिष से कर सकते हैं
कुंडली में घर का योग देखने के लिए चतुर्थ भाव का प्रयोग किया जाता है साथ ही मंगल का भी विचार आवश्यक होगा
कई बार ऐसे भी अनुभव सामने आये हैं जहाँ व्यक्ति के पास घर तो है पर वह वहां रह नहीं सकता
उसने कई जगह भूमि या घर खरीदें है पर उपयोग कोई और कर रहा होता है या उसमे विवाद चल रहा होता है आदि........

मंगलवार, अगस्त 17, 2010

वाहन योग 



हम वाहन  योगों की अगले अंशों में यह देखते हैं क़ि बड़े वाहनों का योग कब बनता है........
१ जब चन्द्र चतुर्थ -भाव के स्वामी के साथ या लग्न के स्वामी के 
साथ होकर लग्न में  हो|
२. चतुर्थ भाव  का स्वामी शुक्र के साथ लग्न में हो |
३.शुक्र और चन्द्र बलवान होकर केंद्र या त्रिकोण में हों|
४.यदि बलवान गुरु और चन्द्र का शुभ सम्बन्ध हो|
५.शुक्र,चन्द्र,गुरु और लग्नेश एक ही जगह हों |
६.चतुर्थ का स्वामी और गुरु एक साथ हों|
७.चतुर्थ भाव और दशम भाव के स्वामियों का सम्बन्ध हो|
इन सभी योगों में मानव बड़े वाहनों को प्राप्त करता है 
क्रमशः ...........................

रविवार, अगस्त 15, 2010

वाहन योग

जन्म कुंडली में वाहन का विचार चतुर्थ भाव से किया जाता है |
चतुर्थ भाव के साथ ही शुक्र भी विचारणीय होता है|
१ यदि कुंडली में चतुर्थ भाव का स्वामी उसी भाव में बैठा हो और अंशों में बलवान हो |
२ यदि चतुर्थ भाव में शुक्र,चन्द्र बैठे हो या देख  रहे हों |
३ चतुर्थ भाव में शनि या राहु का प्रभाव प्रतिकूल न  हों |
४ सूर्य उच्च या स्वराशि का होकर चतुर्थ या दशम में बैठा हो |
५ मंगल स्वराशि,उच्च राशि का होकर दशम,लग्न,भाग्य स्थान में   बैठा हो
बुध स्वगृही,उच्च,मित्रगेही होकर चतुर्थ दशम में बैठा हो|
७ गुरु लग्न,दशम,चतुर्थ,भाग्य,अष्टम,सप्तम में बलवान होकर बैठा हो|
८,शुक्र चतुर्थ,सप्तम,लग्न आदि स्थानों में शुभ दृष्ट हो|

शनिवार, अगस्त 14, 2010

वन्दे मातरं

शुभ कामनाएं 
भारत देश के स्वतंत्रता पर्व की सभी भारत वासियों को शुभ-कामनाएं|
हम आज जिन महापुरुषों के बलिदान,त्याग,परिश्रम से इस स्वतंत्रता को 
मना रहे हैं ऐसे महापुरुषों को शत-शत नमन |
वन्दे मातरं,भारत-माता की जय,
आज के दिन हम सभी यह व्रत लें क़ि अपने देश की उन्नति में सकारात्मक सहयोग देते हुए अपने देश की गरिमा,संस्कृति,संपत्ति,और संस्कृत भाषा की रक्षा करेंगे||

बुधवार, अगस्त 11, 2010

विद्या विचार

विद्या विचार
जन्म कुंडली में विद्या का विचार मूलतः पंचम भाव से किया जाता है | विद्या का वाणी से सूक्ष्म समंध है तो निश्चित है क़ि दूसरा भाव भी विद्या योग के लिए सहयोगी होगा| पुराने समय में विद्या के महत्त्व आत्म ज्ञान से ज्यादा सम्न्धित था क्योंकि उस समय शिक्षा का उद्देश्य ही सा विद्या या विमुक्तये यह था | अतः आज क़ि परिभाषा में चतुर्थ भाव भी विद्या के लिए सहयोगी है| साथ ही आज शिक्षा परीक्षा के आधीन है अतः दशम भाव भी विचारणीय होगा |
विद्या प्राप्ति  के लिए मन का नियंत्रण और समझाने के लिए बुद्धि क़ि भी आवश्यकता होगी अतः इन दोनों के लिए चन्द्र और  बुध क़ि स्थिति भी दृष्टव्य  होगी| विद्या क़ि स्थिरता का विचार गुरु से किया जाता है| अधिकतर जिन कुंडलियों में बुध स्वग्रही,मित्रग्रही,उच्च भावस्थ,शुभ से देखा हुआ होता है उनकी लेखन कला बहुत ही उत्तम होती  है | 
1 . यदि पंचम भाव में गुरु होता है तो विद्या प्राप्ति में बाधक पाया गया है |
2 . यदि पंचम भाव में शुक्र बुध क़ि युति हो तब भी विद्या अध्ययन में बाधा होती है |
3 . यदि चतुर्थ भाव का स्वामी 6,8,12,में हो तो माध्यमिक शिक्षा बाधित होती है|
4 यदि दशम भाव में शनि का बलवान प्रभाव प्रतिकूल हो तो परीक्षा में हमेशा बाधा आती है | ज्यादातर ऐसे योगों में लोग कई बार फ़ैल भी  हो जाये है |  क्रमशः ............................

शनिवार, अगस्त 07, 2010

Kavya yog

Kavya yog-
Kark rashi lagna me chandra ho ya lagna ko chandra
aur lagna par guru ki drushti to kavya yog hota hai,
yog fal-
Is yog me janm lene wala.kavya shastr ka gyata,kavita nirman karne wala,sahrdaya,sabhi se sneh karne wala ,bhavuk,kalpna sheel aur kavya ke madhyam se khyati prapta karne wala hota hai .
Vishesh-
Is yog me utpanna log shiksha,lekhan kala ke dwara samman prapt karte hai.

Navesh yog

Navesh yog-
Lagn ka swami balwan hokar kendra me baitha ho aur use shbh grah parantu kisi papgrah ki drushti na ho to navesh yog hota hai.
Yog fal-
is yog me utpann huaa manav gunwan,chatur,dirghayu,prabal bhagyashali,sabhi se sahyog prapt karne wala,sabhi se samman prapt karne wala hota hai.

Kusum yog

kusum yog-
lagn me guru ,saptam me chandra aur dusare bhav me
surya ho to kusum yog hota hai.
yog fal- yesa vyakti man maryada ka khyal karne wala,
adhik bhumi ka swami hota hai,sabse samman pane wala,
keertiwan,dhanwan aur bhumi sambandhi vyavsay
 karne wala hota hai.

गुरुवार, अगस्त 05, 2010

Kundali me yog

योग
कुंडली में ग्रहों के द्वारा बनने वाले अंश गत / राशि गत संबंधों को योग  कहते हैं|
ग्रहों के द्वारा बनने वाले योग ४ प्रकार के होते है -
१-स्थान गत सम्बन्ध
२-दृष्टि गत
३-राशि गत
४-भाव गत सम्बन्ध
इन योगों के द्वारा ग्रहों का फल प्रभावित होता है क्योंकि बिना किसी योग के ग्रह पूरा फल नहीं देता| इन्ही योगों के द्वारा व्यक्ति लाभान्वित होता है |
हरि-हर ब्रह्म योग
यह योग निम्न स्थितियों  में बनता है-
१-दूसरे भाव के  स्वामी से ८ वे या १२ वे भाव में शुभ ग्रह हो |
२-सप्तम भाव से ४,८ या नवम भाव में गुरु,चन्द्र और बुध बैठे हों|
३-लग्न का स्वामी जिस स्थान पर हो उस स्थान से ४,१०,११ भाव में सूर्य ,शुक्र और मंगल हो|
फल-
इस योग में उत्पन्न जातक परम-पवित्र विचारों वाला,सत्य-भाषी,अपने सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा करने वाला,ईश्वर-भक्त,प्रसन्न-चित्त,हास्य-प्रिय,परोपकारी , गुनग्राही और विद्वान होता है|  

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पाराशर के अनुसार ग्रह दृष्टि

पश्यन्ति सप्तमं सर्वे शनि जीव कुजः पुनः ।  विशेषतश्च त्रिदशत्रिकोणचतुरष्टमान् || भावः - यहाँ पर ग्रहों की दृष्टि के बारे में बतलाते हु...