गुरुवार, अप्रैल 15, 2010

rashi chakra/rashi swami chakra

यह कुंडली चक्र राशी स्वामी को बताता है जैसे -मेष का स्वामी मंगल ,वृषभ का स्वामी शुक्र इत्यादि .........
इसी को कालपुरुष कुंडली चक्र भी कहते हैं |
यह विषय पूर्व में  दिया जा चुका है |

kundali chakra,

यह चक्र जन्मांग ,लग्न चक्र आदि नामों से जाना जाता है |

मंगलवार, अप्रैल 13, 2010

jyotish bhavishya,my kundali: पढ़ें

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raj yog,naulkari

कुंडली में राजयोग का नाम बहुत ही विख्यात है| वस्तुतः यह राज योग शब्द आज भ्रामक बन गया है| राज योग से हमने केवल राजा बनना ही अर्थ लगाया है |
राज योग का अर्थ यदि हम संस्कृत क़ि दृष्टि से देखे तो-
राज्ञः योगः इति अर्थात षष्ठी तत्पुरुष समास में यह शब्द बनता है जिसका शब्दार्थ होती है राजा का योग| 
अब यदि हम इसका भावार्थ देखे तो व्यापक रूप में यह समझ में आता है क़ि पहले समय में राज तंत्र क़ि व्यवस्था थी परन्तु आज प्रजा तंत्र होने के कारण यह शब्द आज परिभाषित नहीं  होगा | तो यह शब्द आज विशेष धन प्राप्ति ,विशेष शासन,विशेष पद की प्राप्ति के लिए प्रयोग किया जाता है|
अतः  विशेष पद आई.एस .ऑफिसर्स .मंत्री , जैसे पद आते हैं| अब 
इन पदों के लिए ग्रहों का बल के अनुसार निर्णय करना होता है|
कुंडली में ग्रहों का बलाबल के अनुसार राजयोग का प्रभाव और राजयोग का लाभ प्राप्त किया जाता है|

mera vichar

भारतीय ज्योतिष शास्त्र अपने आप में ही विशाल और समुद्र के सामान है जो मानव जीवन के लिए हर विधि से उपयोगी और परोपकारी है | ज्योतिष शास्त्र एक दर्पण के समान है जो चहरे को देखते ही वह चहरे को स्पष्ट कर देता है|
     अतः यदि हम एक विषय को लेकर भी चर्चा करें तो उसके लिए भी अधिक समय अपेक्षित होगा| इसीलिए हम क्रमशः कुंडली विचार का अध्ययन करेंगे| मेरा अनुभव है सभी भविष्य साधक विधियाँ आपस में एक जैसी ही हैं| ज्योतिष शास्त्र मूलतः संस्कृत में विद्यमान है| यद्यपि आज अनुवाद प्रणाली ने सभी पुस्तकों को अनुवाद द्वारा उपयोगी बनाया जा रहा है| ज्योतिष शास्त्र में यह ग्रन्थ उपयोगी और परोपकारी हैं जैसे -
१ बृहद पराशर होरा शास्त्र
२- बृहद जातक
३ सारावली
४-लघु  पाराशरी
५- बृहद संहिता
६- फल दीपिका
७- भृगु संहिता
एसे ही अनेको ग्रन्थ संस्कृत में भारतीय मनीषियों के द्वारा गहन अध्ययन और तप साधना से लिखे गए| यद्यपि सभी शास्त्रों को और शोधों को समय के अनुसार नए विचारों की आवश्यकता होती है| यह विचार किसी भी भाषा में भले हों परन्तु संस्कृत के बिना अधूरे ही रहेंगे| अतः मेरा अनुरोध है क़ि सब कुछ जानने के साथ ही संस्कृत अवश्य जाने संस्कृत अवश्य बोलें|

रविवार, अप्रैल 04, 2010

भाव फल .भाव विचार,कुंडली,

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नवम भाव विचार -
अभी तक हमने ज्योतिष भाव विचार लेख के अन्दर अष्टम भाव विचार माला तक का अध्ययन कर किया हैं
अब हम नवम भाव का विचार करेंगे -
नवम भाव को धर्म,भाग्य ,उपासना के नाम से भी जाना जाता है अतः स्वाभाविक रूप से मुख्यतः भाग्य ,धर्म,यज्ञ,पूजा,देवता,उपासना,का विचार तो होता ही है दक्षिण भारत में पिता का विचार भी इसी भाव से किया जाता है यद्यपि उत्तर भारत में पिता का विचार दशम भाव से किया जाता है मेरे विचार में भी पिता का विचार नवम भाव से करना अनुभव में उपयुक्त पाया गया है
दशम भाव - यह भाव कर्म , कार्य क्षेत्र , सफलता ,वृद्धि,उन्नति,प्रभाव,वर्चस्व को बताता है
एकादश भाव - यह भाव आय , लाभ,विद्या का लाभ ,संतान का जीवन साथी , शेयर बाज़ार को बताता है
द्वादश भाव - हानि ,विदेश यात्रा , कष्ट ,व्यय,स्वास्थ्यका विचार बताता है

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